कावेरी नदी के प्रवाह में गिरावट का रुझान
इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (IIT) गांधीनगर के एक हालिया अध्ययन में कावेरी नदी में एक चिंताजनक रुझान सामने आया है। शोध से पता चलता है कि जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के कारण 2050 तक नदी के जल प्रवाह में लगातार गिरावट आ सकती है।
अध्ययन के अनुसार, 2026 और 2050 के बीच नदी के कुल प्रवाह में 3.5% की कमी का अनुमान है। यह क्रमिक गिरावट दक्षिणी राज्यों में कृषि और पेयजल आपूर्ति को काफी हद तक प्रभावित कर सकती है।
स्टैटिक GK तथ्य: कावेरी नदी का उद्गम कर्नाटक के तलकावेरी से होता है और यह तमिलनाडु से होते हुए अंततः बंगाल की खाड़ी में गिरती है।
जल उपलब्धता में ऐतिहासिक गिरावट
इन निष्कर्षों की पुष्टि ऐतिहासिक आंकड़ों से भी होती है, जो नदी के प्रवाह में भारी कमी दर्शाते हैं। 1951 और 2012 के बीच, कावेरी नदी के जल प्रवाह में 28% की कमी देखी जा चुकी है।
यह दीर्घकालिक गिरावट कम वर्षा, बढ़ते तापमान और मानवीय गतिविधियों के संयुक्त प्रभाव को दर्शाती है। यह नदी बेसिन क्षेत्र में जल के सतत प्रबंधन की तत्काल आवश्यकता पर प्रकाश डालती है।
स्टैटिक GK सुझाव: कावेरी बेसिन भारत के सबसे अधिक विवादित नदी बेसिनों में से एक है, जिसमें कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल और पुडुचेरी जैसे राज्य शामिल हैं।
जलवायु मॉडलों का उपयोग करके वैज्ञानिक विश्लेषण
इस अध्ययन में उन्नत CMIP6 (Coupled Model Intercomparison Project Phase 6) जलवायु मॉडलों का उपयोग किया गया है। इन मॉडलों का उपयोग वैश्विक स्तर पर जलवायु के पैटर्न का पूर्वानुमान लगाने और भविष्य के पर्यावरणीय परिवर्तनों का आकलन करने के लिए व्यापक रूप से किया जाता है।
CMIP6 का उपयोग नदी के प्रवाह के रुझानों का अनुमान लगाने में उच्च स्तर की सटीकता सुनिश्चित करता है। यह तापमान में वृद्धि, वर्षा में भिन्नता और वायुमंडलीय परिवर्तनों जैसे कई कारकों (variables) पर विचार करता है।
स्टैटिक GK तथ्य: CMIP6 जलवायु परिवर्तन पर अंतर–सरकारी पैनल (IPCC) के मूल्यांकन ढांचे का एक हिस्सा है, जिसका उपयोग वैश्विक जलवायु पूर्वानुमानों के लिए किया जाता है।
अन्य नदियों में विपरीत रुझान
दिलचस्प बात यह है कि अध्ययन में यह भी बताया गया है कि सभी नदियों को जल स्तर में गिरावट का सामना नहीं करना पड़ेगा। गंगा और सिंधु जैसी प्रमुख नदियों में हिमनदों के पिघलने और वर्षा के बदलते पैटर्न के कारण जल प्रवाह में वृद्धि देखी जा सकती है।
यह विरोधाभास भारत की विभिन्न नदी प्रणालियों पर जलवायु परिवर्तन के असमान प्रभाव को उजागर करता है। जहाँ उत्तरी नदियों को ग्लेशियर से पानी मिलता है, वहीं कावेरी जैसी प्रायद्वीपीय नदियाँ ज़्यादातर बारिश पर निर्भर होती हैं।
स्टैटिक GK टिप: गंगा नदी को मुख्य रूप से हिमालय के ग्लेशियरों से पानी मिलता है, जबकि कावेरी एक वर्षा–पोषित नदी है।
जल सुरक्षा पर असर
कावेरी नदी के घटते जल प्रवाह का जल सुरक्षा, कृषि और राज्यों के आपसी संबंधों पर गंभीर असर पड़ रहा है। पानी की उपलब्धता में कमी से विवाद बढ़ सकते हैं और इस नदी पर निर्भर लाखों लोगों का जीवन प्रभावित हो सकता है।
जल संरक्षण, सिंचाई के कुशल तरीके और जलवायु परिवर्तन के अनुरूप ढलने पर केंद्रित प्रभावी नीतियाँ बनाना बेहद ज़रूरी है। नदी के घटते जल प्रवाह के बुरे प्रभावों को कम करने के लिए दीर्घकालिक योजना बनाना बहुत अहम होगा।
Static Usthadian Current Affairs Table
| विषय | विवरण |
| अध्ययन संस्थान | आईआईटी गांधीनगर |
| नदी | कावेरी नदी |
| अनुमानित गिरावट | 2026–2050 के बीच 3.5% |
| ऐतिहासिक गिरावट | 1951–2012 के बीच 28% |
| उपयोग किया गया जलवायु मॉडल | सीएमआईपी6 |
| प्रभावित क्षेत्र | दक्षिण भारत |
| तुलना नदियाँ | गंगा और सिंधु में वृद्धि |
| प्रमुख चिंता | जल संकट और जलवायु प्रभाव |





