IBC फ्रेमवर्क की पृष्ठभूमि
दिवालियापन और दिवालियापन संहिता (IBC), 2016 कंपनियों और व्यक्तियों के दिवालियापन को हल करने के लिए भारत का प्राथमिक कानून है। इसने बढ़ते गैर–निष्पादित परिसंपत्तियों (NPA) से निपटने के लिए एक समय–सीमा–बद्ध समाधान प्रक्रिया शुरू की। IBC से पहले, कानूनी देरी के कारण दिवालियापन के मामलों में अक्सर वर्षों लग जाते थे। इस संहिता ने वसूली में सुधार किया और बैंकिंग प्रणाली को मज़बूत बनाया। स्थैतिक GK तथ्य: IBC, 2016 ने SICA, 1985 जैसे कई कानूनों की जगह ली और एक ही फ्रेमवर्क के तहत दिवालियापन समाधान को सुव्यवस्थित किया।
2026 संशोधन की मुख्य विशेषताएँ
लोकसभा ने 30 मार्च, 2026 को कार्यक्षमता में सुधार के लिए IBC संशोधन विधेयक 2026 पारित किया। यह संशोधन तेज़ समाधान और मुकदमों में कमी पर केंद्रित है। एक प्रमुख प्रावधान यह अनिवार्य करता है कि चूक साबित होने के 14 दिनों के भीतर दिवालियापन आवेदनों को स्वीकार कर लिया जाए। यह कार्यवाही की शीघ्र शुरुआत सुनिश्चित करता है। यह सुधार प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी और सुव्यवस्थित बनाने के लिए संरचनात्मक बदलाव भी लाता है। स्थैतिक GK सुझाव: भारतीय दिवालियापन और दिवालियापन बोर्ड (IBBI) भारत में दिवालियापन पेशेवरों और प्रक्रियाओं को विनियमित करता है।
लेनदार–संचालित मॉडल की ओर बदलाव
यह संशोधन एक लेनदार–संचालित दिवालियापन फ्रेमवर्क पेश करता है, जिससे उधारदाताओं को अधिक नियंत्रण मिलता है। यह लेनदारों और देनदारों दोनों के अधिकारों को संतुलित करता है। नए तंत्रों में अदालत के बाहर समझौते और ‘देनदार–के–कब्ज़े वाला‘ (debtor-in-possession) मॉडल शामिल हैं। ये अदालतों पर निर्भरता कम करते हैं और देरी को न्यूनतम करते हैं। ‘लेनदार–के–नियंत्रण वाला‘ दृष्टिकोण समाधान के दौरान तेज़ निर्णय लेने को सुनिश्चित करता है।
गति और पारदर्शिता पर ज़ोर
IBC के तहत प्रमुख मुद्दों में से एक मुकदमों में अत्यधिक देरी थी। यह संशोधन समय–सीमाओं को कड़ा करके सीधे तौर पर इस समस्या का समाधान करता है। मुख्य उपायों में मामलों की तेज़ स्वीकृति और दिवालियापन प्रावधानों के दुरुपयोग को रोकने के लिए सुरक्षा उपाय शामिल हैं। कानूनी बाधाओं को कम करने के लिए प्रक्रियाओं को सरल बनाया गया है। इससे व्यापार करने में समग्र सुगमता और निवेशकों का विश्वास बढ़ता है। स्थैतिक GK तथ्य: IBC जैसे सुधारों के बाद भारत ने ‘व्यापार करने में सुगमता‘ (Ease of Doing Business) सूचकांक में अपनी रैंक में उल्लेखनीय सुधार किया।
सीमा–पार और समूह दिवालियापन की शुरुआत
इस संशोधन के ज़रिए पहली बार सीमा–पार दिवालियापन से जुड़े प्रावधान पेश किए गए हैं। इससे भारत वैश्विक तौर-तरीकों के साथ कदम मिला पाता है। अब कई देशों में काम करने वाली कंपनियाँ एक साथ मिलकर समाधान प्रक्रिया से गुज़र सकती हैं। यह ‘समूह दिवालियापन‘ की सुविधा भी देता है, जिसमें आपस में जुड़ी कंपनियों का समाधान एक साथ किया जाता है। वैश्वीकृत कारोबारी माहौल में ये बदलाव बेहद अहम हैं।
बैंकिंग क्षेत्र पर असर
IBC के तहत अब तक 1,376 से ज़्यादा कंपनियों का समाधान किया जा चुका है, जिससे लगभग ₹4.11 लाख करोड़ की वसूली हुई है। NPA (गैर–निष्पादित परिसंपत्तियाँ) को कम करने में इसने अहम भूमिका निभाई है। उम्मीद है कि इस संशोधन से वसूली की दरें बेहतर होंगी और ऋण अनुशासन मज़बूत होगा। बैंकों को समाधान की तेज़ प्रक्रियाओं से फ़ायदा मिलेगा। इससे भारत की वित्तीय प्रणाली की स्थिरता और बढ़ती है।
श्रमिकों की सुरक्षा
यह संशोधन सुनिश्चित करता है कि दिवालियापन की स्थिति में श्रमिकों का बकाया सबसे पहले चुकाया जाए। परिसमापन या पुनर्गठन के दौरान भी कर्मचारियों के हितों की रक्षा की जाती है। इससे आर्थिक दक्षता और सामाजिक ज़िम्मेदारी के बीच संतुलन बना रहता है।
स्टेटिक GK टिप: IBC के तहत, 24 महीनों तक के श्रमिकों के बकाए को भुगतान की प्राथमिकता सूची में ऊँचा स्थान दिया गया है।
Static Usthadian Current Affairs Table
| विषय | विवरण |
| कानून | दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता (संशोधन) विधेयक 2026 |
| तिथि | 30 मार्च 2026 को पारित |
| प्रमुख सुधार | मामलों की 14 दिनों में अनिवार्य स्वीकृति |
| मॉडल परिवर्तन | ऋणदाता-प्रेरित दिवाला ढांचा |
| नई विशेषताएँ | सीमा-पार और समूह दिवाला प्रावधान |
| बैंकिंग प्रभाव | NPA वसूली में सुधार और ऋण अनुशासन |
| श्रमिक संरक्षण | श्रमिकों के बकाया को प्राथमिकता |
| उद्देश्य | तेज समाधान और मुकदमेबाजी में कमी |





