फ्रेमवर्क का बैकग्राउंड
भारत सरकार ने भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) के महंगाई को टारगेट करने वाले फ्रेमवर्क को मार्च 2031 तक बढ़ा दिया है। 2016 में शुरू होने के बाद से यह दूसरी बार बढ़ाया गया है, जिससे पॉलिसी में निरंतरता बनी रहती है।
इस फ्रेमवर्क का मकसद रिटेल महंगाई को 4% पर बनाए रखना है, जिसमें ±2% की छूट की गुंजाइश होती है। इससे यह पक्का होता है कि महंगाई 2% से 6% के बीच रहे, जिससे कीमतों में स्थिरता और आर्थिक विकास के बीच संतुलन बना रहे।
स्टैटिक GK फैक्ट: भारतीय रिज़र्व बैंक की स्थापना 1935 में RBI एक्ट, 1934 के तहत हुई थी।
4 परसेंट के टारगेट को समझना
भारत ‘फ्लेक्सिबल इन्फ्लेशन टारगेटिंग‘ (FIT) सिस्टम को अपनाता है, जिसमें महंगाई को एक तय टारगेट के करीब रखा जाता है, लेकिन इसमें थोड़े समय के लिए लचीलेपन की गुंजाइश भी होती है। 4% का टारगेट मॉनेटरी पॉलिसी से जुड़े फैसलों के लिए एक बेंचमार्क का काम करता है।
यह टारगेट कारोबारियों और निवेशकों को स्पष्टता देता है, जिससे वे बेहतर योजना बना पाते हैं। साथ ही, यह उपभोक्ताओं को कीमतों में बेतहाशा बढ़ोतरी या कीमतों में गिरावट (deflation) के जोखिमों से भी बचाता है।
स्टैटिक GK टिप: भारत में महंगाई को मुख्य रूप से ‘कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स‘ (CPI) का इस्तेमाल करके मापा जाता है।
RBI और MPC की भूमिका
महंगाई को काबू में रखने की ज़िम्मेदारी ‘मॉनेटरी पॉलिसी कमेटी‘ (MPC) की होती है। यह छह सदस्यों वाली एक कमेटी है, जिसकी अध्यक्षता RBI के गवर्नर करते हैं। MPC समय-समय पर बैठकें करके आर्थिक हालात की समीक्षा करती है।
इसके लिए मुख्य रूप से ‘रेपो रेट‘ का इस्तेमाल किया जाता है, जिसका असर उधार लेने की लागत पर पड़ता है। जब महंगाई बढ़ती है, तो RBI ब्याज दरें बढ़ा देता है, जिससे मांग में कमी आती है। वहीं, जब महंगाई कम होती है, तो आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए ब्याज दरें घटाई जा सकती हैं।
यह फ्रेमवर्क डेटा के आधार पर फैसले, पारदर्शिता और जवाबदेही को बढ़ावा देता है। अगर लगातार तीन तिमाहियों तक महंगाई तय सीमा से बाहर रहती है, तो RBI को उसे ठीक करने के लिए उठाए गए कदमों के बारे में बताना ज़रूरी होता है।
महंगाई के हालिया रुझान
फरवरी 2026 में भारत की रिटेल महंगाई दर 3.21% रही, जबकि जनवरी में यह 2.74% थी। यह दिखाता है कि कीमतें अभी भी सामान्य स्तर पर हैं। इसका मतलब है कि महंगाई अभी भी तय टारगेट की सीमा के अंदर ही है।
CPI को नए आधार वर्ष (Base Year) 2024 के हिसाब से अपडेट किया गया है, जो लोगों के खर्च करने के बदलते तरीकों को दिखाता है। हालांकि, मौसम और सप्लाई के हालात पर निर्भरता की वजह से खाने–पीने की चीज़ों की महंगाई अभी भी एक बड़ी चिंता बनी हुई है।
स्टैटिक GK तथ्य: भारत की CPI बास्केट में खाने–पीने की चीज़ों का वज़न लगभग 45% होता है।
2031 तक विस्तार के कारण
उसी लक्ष्य को बनाए रखने का फ़ैसला मौजूदा ढांचे में भरोसे को दिखाता है। सप्लाई चेन में रुकावटों और भू–राजनीतिक तनाव जैसी वैश्विक चुनौतियों के बावजूद, इस व्यवस्था ने स्थिरता सुनिश्चित की है।
RBI ने अगस्त 2025 में एक चर्चा पत्र जारी किया था, जिसमें संभावित बदलावों पर जनता से राय मांगी गई थी। सुझावों में कोर महंगाई दर पर जाने या सहनशीलता सीमा (tolerance band) में बदलाव करने की बात शामिल थी।
मूल्यांकन के बाद, सरकार ने मौजूदा ढांचे को ही बनाए रखने का फ़ैसला किया, जिससे नीति की विश्वसनीयता और निवेशकों का भरोसा बना रहे।
अर्थव्यवस्था के लिए इसका महत्व
यह विस्तार व्यापक आर्थिक स्थिरता को बढ़ावा देता है और वैश्विक बाज़ारों में भारत की स्थिति को मज़बूत करता है। यह अनिश्चितता को कम करता है और महंगाई दर से जुड़ी उम्मीदों को नियंत्रित रखने में मदद करता है।
कीमतों के स्तर को अनुमानित बनाकर, यह ढांचा टिकाऊ विकास, निवेश और रोज़गार सृजन को बढ़ावा देता है। यह भारत को मौद्रिक नीति के क्षेत्र में वैश्विक स्तर पर अपनाए जाने वाले बेहतरीन तरीकों के साथ भी जोड़ता है।
आगे की राह
भारत को महंगाई दर का अनुमान लगाने वाले मॉडल्स में सुधार करना होगा, खाने–पीने की चीज़ों की सप्लाई चेन को मज़बूत बनाना होगा और बाहरी जोखिमों को कम करना होगा। राजकोषीय और मौद्रिक नीतियों के बीच बेहतर तालमेल बनाना बेहद ज़रूरी है।
कीमतों में स्थिरता और विकास के बीच संतुलन बनाए रखने पर लगातार ध्यान देने से भारत वैश्विक अनिश्चितताओं का प्रभावी ढंग से सामना कर पाएगा और लंबे समय तक आर्थिक विकास की गति को बनाए रख पाएगा।
Static Usthadian Current Affairs Table
| विषय | विवरण |
| ढांचा विस्तार | मार्च 2031 तक |
| मुद्रास्फीति लक्ष्य | 4% |
| सहनशीलता सीमा | 2% से 6% |
| प्रारंभ वर्ष | 2016 |
| संचालन निकाय | मौद्रिक नीति समिति |
| मुख्य उपकरण | रेपो दर |
| नवीनतम मुद्रास्फीति (फरवरी 2026) | 3.21% |
| मुद्रास्फीति माप | उपभोक्ता मूल्य सूचकांक |
| कार्यान्वयन प्राधिकरण | भारतीय रिज़र्व बैंक |





