कोर्ट का फ़ैसला
मद्रास हाई कोर्ट ने फ़ैसला सुनाया कि तमिलनाडु सरकार तीसरी गर्भावस्था के लिए मातृत्व अवकाश को सिर्फ़ 12 हफ़्तों तक सीमित नहीं कर सकती। यह फ़ैसला तब आया जब राज्य सरकार ने 13 मार्च, 2026 को एक सरकारी आदेश (G.O.) जारी किया था, जिसमें तीसरी बार बच्चे के जन्म के दौरान महिला कर्मचारियों के लिए अवकाश लाभों को सीमित कर दिया गया था।
कोर्ट ने साफ़ किया कि महिला सरकारी कर्मचारी तीसरी गर्भावस्था के दौरान भी 365 दिनों के मातृत्व अवकाश की हकदार हैं। कोर्ट ने कहा कि हर गर्भावस्था में शारीरिक दर्द, भावनात्मक तनाव और बच्चे की देखभाल की ज़िम्मेदारियाँ एक जैसी ही रहती हैं।
स्टैटिक GK तथ्य: मद्रास हाई कोर्ट भारत के सबसे पुराने हाई कोर्ट में से एक है और इसकी स्थापना 1862 में ब्रिटिश शासन के दौरान हुई थी।
भेदभाव के ख़िलाफ़ रुख़
कोर्ट ने ज़ोर देकर कहा कि पहली, दूसरी और तीसरी गर्भावस्था के बीच भेदभाव करना असंवैधानिक है। फ़ैसले के अनुसार, मातृत्व लाभ एक महिला की गरिमा और प्रजनन अधिकारों का हिस्सा हैं, जिन्हें संविधान के तहत संरक्षण प्राप्त है।
जजों ने कहा कि सिर्फ़ इसलिए मातृत्व अवकाश को सीमित करना कि यह तीसरी बार बच्चे का जन्म है, समानता और कल्याण के सिद्धांतों का उल्लंघन है। कोर्ट ने इस बात पर भी ज़ोर दिया कि गर्भावस्था की संख्या के आधार पर मातृत्व को अलग नज़रिए से नहीं देखा जा सकता।
स्टैटिक GK टिप: संविधान का अनुच्छेद 14 क़ानून के समक्ष समानता की गारंटी देता है, जबकि अनुच्छेद 15 लिंग सहित किसी भी आधार पर भेदभाव को प्रतिबंधित करता है।
अनुच्छेद 162 और सरकारी शक्ति
राज्य सरकार ने भारत के संविधान के अनुच्छेद 162 का हवाला देते हुए इस आदेश का बचाव किया; यह अनुच्छेद राज्य सरकारों को कार्यपालिका शक्तियाँ प्रदान करता है। हालाँकि, कोर्ट ने कहा कि कार्यपालिका शक्तियाँ महिला कर्मचारियों को दिए गए बुनियादी कल्याणकारी संरक्षणों को कमज़ोर नहीं कर सकतीं।
फ़ैसले में समझाया गया कि मातृत्व अधिकार सामाजिक न्याय और कर्मचारी कल्याण से जुड़े हुए हैं। इसलिए, इन अधिकारों को कम करने वाला कोई भी प्रशासनिक आदेश क़ानूनी जाँच में सही नहीं ठहर सकता।
स्टैटिक GK तथ्य: अनुच्छेद 162 राज्य सरकारों की कार्यपालिका शक्ति से संबंधित है और उन्हें राज्य सूची तथा समवर्ती सूची में शामिल विषयों पर निर्णय लेने की अनुमति देता है।
सुप्रीम कोर्ट का संदर्भ
मद्रास हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के उन पिछले फ़ैसलों का हवाला दिया, जिनमें तीसरी गर्भावस्था के लिए भी मातृत्व अवकाश का समर्थन किया गया था। कोर्ट ने बताया कि न्यायिक मिसालें पहले से ही मातृत्व लाभों को एक आवश्यक श्रम अधिकार के रूप में मान्यता देती हैं।
फ़ैसले में आगे कहा गया कि मातृत्व एक जैविक और सामाजिक ज़िम्मेदारी है, जिसे पूरा संस्थागत सहयोग मिलना चाहिए। पूरे भारत में अदालतों ने बार-बार मातृत्व अवकाश कानूनों की व्याख्या महिला कर्मचारियों के पक्ष में की है।
Static GK Tip: मातृत्व लाभ अधिनियम, 1961 भारत में महिला कर्मचारियों के लिए मातृत्व लाभों को नियंत्रित करने वाला मुख्य कानून है।
महिला कर्मचारियों पर प्रभाव
यह फैसला तमिलनाडु के सरकारी विभागों में काम करने वाली महिलाओं के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। यह कार्यस्थल पर कल्याणकारी उपायों को मज़बूत करता है और महिलाओं को सेवा के प्रतिबंधात्मक नियमों से बचाता है।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला भारत के अन्य राज्यों में भी इसी तरह के मातृत्व लाभ विवादों को प्रभावित कर सकता है। यह लैंगिक रूप से संवेदनशील श्रम नीतियों के लिए न्यायिक समर्थन को भी मज़बूत करता है।
Static Usthadian Current Affairs Table
| विषय | विवरण |
| संबंधित न्यायालय | मद्रास उच्च न्यायालय |
| संबंधित राज्य | तमिलनाडु |
| मुख्य मुद्दा | तीसरी गर्भावस्था के लिए मातृत्व अवकाश पर प्रतिबंध |
| सरकारी आदेश की तिथि | 13 मार्च 2026 |
| सरकारी आदेश द्वारा सीमित अवकाश | 12 सप्ताह |
| न्यायालय द्वारा स्वीकृत अवकाश | 365 दिन |
| संवैधानिक प्रावधान | अनुच्छेद 162 |
| संबंधित केंद्रीय कानून | मातृत्व लाभ अधिनियम, 1961 |
| महत्वपूर्ण सिद्धांत | गर्भावस्थाओं के बीच कोई भेदभाव नहीं |
| न्यायिक समर्थन | सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों पर आधारित |





