भारत ने पहले गैंगेस सॉफ्टशेल कछुए को सैटेलाइट डिवाइस से टैग किया
भारत ने काजीरंगा नेशनल पार्क और टाइगर रिज़र्व में देश के पहले सैटेलाइट–टैग किए गए गैंगेस सॉफ्टशेल कछुए को छोड़कर वन्यजीव संरक्षण में एक बड़ी उपलब्धि हासिल की है। यह पहल ‘लुप्तप्राय प्रजाति दिवस‘ पर शुरू की गई थी ताकि इस प्रजाति के बारे में वैज्ञानिक समझ बेहतर हो सके और लंबे समय तक चलने वाले संरक्षण प्रयासों को मजबूत किया जा सके।
सैटेलाइट-टैग किया गया कछुआ शोधकर्ताओं को ब्रह्मपुत्र नदी के इकोसिस्टम में उसकी गतिविधियों, रहने की जगहों के इस्तेमाल और जीवित रहने की क्षमता पर नज़र रखने में मदद करेगा, जिससे भविष्य की संरक्षण योजनाओं के लिए मूल्यवान डेटा मिलेगा।
स्टैटिक GK तथ्य: असम में काजीरंगा नेशनल पार्क एक UNESCO विश्व धरोहर स्थल है और यह ‘ग्रेटर वन–हॉर्न्ड राइनोसिरस‘ (एक सींग वाले गैंडे) के संरक्षण के लिए दुनिया भर में मशहूर है।
गैंगेस सॉफ्टशेल कछुए के बारे में
गैंगेस सॉफ्टशेल कछुआ (निल्सोनिया गैंजेटिका) मीठे पानी का एक बड़ा कछुआ है जो भारतीय उपमहाद्वीप की नदियों, झीलों और जलाशयों में पाया जाता है। इसकी पहचान सिर पर तीर के निशान जैसे खास निशानों और इसकी लंबी उम्र से होती है।
इतनी बड़ी संख्या में पाए जाने के बावजूद, इस प्रजाति को रहने की जगहों के खराब होने, नदी के प्रदूषण, अवैध शिकार और मछली पकड़ने के जाल में गलती से फंसने जैसे खतरों का सामना करना पड़ रहा है। इसी वजह से, इसे IUCN रेड लिस्ट में ‘लुप्तप्राय‘ (Endangered) श्रेणी में रखा गया है।
स्टैटिक GK टिप: IUCN रेड लिस्ट दुनिया का सबसे व्यापक ग्लोबल डेटाबेस है जो पौधों और जानवरों की प्रजातियों के संरक्षण की स्थिति का आकलन करता है।
सैटेलाइट टैगिंग का महत्व
यह पहली बार है जब भारत में गैंगेस सॉफ्टशेल कछुए में सैटेलाइट ट्रांसमीटर लगाया गया है। इस प्रोजेक्ट का मकसद मौसमी प्रवास, रहने के दायरे (होम रेंज), प्रजनन और घोंसले बनाने की जगहों और रहने की पसंदीदा जगहों के बारे में वैज्ञानिक जानकारी इकट्ठा करना है।
इससे मिलने वाले डेटा से संरक्षणवादियों को अहम आवासों की पहचान करने, सुरक्षा की असरदार रणनीतियां बनाने और ब्रह्मपुत्र बेसिन में मीठे पानी की जैव–विविधता के प्रबंधन को बेहतर बनाने में मदद मिलेगी।
सहयोगात्मक संरक्षण पहल
सैटेलाइट-टैगिंग की इस प्रक्रिया में एक स्वस्थ वयस्क कछुए को सुरक्षित रूप से पकड़ा गया, पशु चिकित्सकों की देखरेख में हल्का सैटेलाइट ट्रांसमीटर लगाया गया और उसे बिना किसी नुकसान के उसके प्राकृतिक आवास में वापस छोड़ दिया गया। यह प्रोजेक्ट नेशनल ज्योग्राफिक सोसाइटी के सहयोग से पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC), असम वन विभाग, काजीरंगा नेशनल पार्क के अधिकारियों और वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (WII) की संयुक्त कोशिशों से लागू किया गया था।
स्टैटिक GK फैक्ट: वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (WII) पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के तहत एक स्वायत्त संस्थान है और इसका मुख्यालय देहरादून, उत्तराखंड में है।
मीठे पानी के कछुओं के संरक्षण में काजीरंगा की भूमिका
काजीरंगा का इलाका भारत में मीठे पानी के कछुओं के लिए सबसे महत्वपूर्ण आवासों में से एक है। यहाँ देश में पाई जाने वाली आठ सॉफ्टशेल कछुआ प्रजातियों में से पाँच पाई जाती हैं, जिससे यह कछुआ संरक्षण के लिए एक प्राथमिकता वाला क्षेत्र बन जाता है।
पार्क की विशाल आर्द्रभूमि (वेटलैंड्स) और ब्रह्मपुत्र नदी के किनारे इसकी स्थिति कई जलीय प्रजातियों के प्रजनन, भोजन और जीवित रहने के लिए आदर्श पारिस्थितिक स्थितियाँ प्रदान करती है।
पारिस्थितिक महत्व
गैंगेस सॉफ्टशेल कछुआ एक प्राकृतिक सफाईकर्मी (स्कैवेंजर) के रूप में काम करके एक महत्वपूर्ण पारिस्थितिक भूमिका निभाता है। यह मृत और सड़ने वाले कार्बनिक पदार्थों को खाता है, जिससे नदी के पारिस्थितिकी तंत्र को साफ और स्वस्थ रखने में मदद मिलती है।
इस प्रजाति को मीठे पानी के पारिस्थितिकी तंत्र के स्वास्थ्य का एक महत्वपूर्ण संकेतक भी माना जाता है, जिससे जलीय जैव विविधता को बनाए रखने के लिए इसका संरक्षण महत्वपूर्ण हो जाता है।
स्टैटिक GK टिप: खतरे में पड़ी प्रजातियों और उनके आवासों के संरक्षण के बारे में जागरूकता बढ़ाने के लिए हर साल मई के तीसरे शुक्रवार को ‘लुप्तप्राय प्रजाति दिवस‘ (Endangered Species Day) मनाया जाता है।
उस्तादियन समसामयिकी स्थायी तथ्य तालिका
| तथ्य | विवरण |
| प्रजाति | गंगा सॉफ्टशेल कछुआ (Nilssonia gangetica) |
| संरक्षण उपलब्धि | भारत का पहला उपग्रह-टैगयुक्त गंगा सॉफ्टशेल कछुआ |
| छोड़े जाने का स्थान | काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान एवं बाघ अभयारण्य, असम |
| अवसर | लुप्तप्राय प्रजाति दिवस |
| संरक्षण स्थिति | संकटग्रस्त—अंतरराष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (IUCN) की लाल सूची |
| प्रमुख उद्देश्य | गतिविधियों, आवास उपयोग, प्रजनन तथा घोंसला बनाने वाले स्थानों की निगरानी करना |
| कार्यान्वयन संस्थाएँ | पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC), असम वन विभाग, भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) और काजीरंगा प्रशासन |
| सहयोगी संस्था | नेशनल ज्योग्राफिक सोसाइटी |
| प्रमुख नदी पारिस्थितिकी तंत्र | ब्रह्मपुत्र नदी |
| WII का मुख्यालय | देहरादून, उत्तराखंड |





