भारत ने क्लाइमेट इक्विटी पर ज़ोर दिया
भारत ने फिर से कहा है कि वैश्विक जलवायु कार्रवाई क्लाइमेट इक्विटी, ऐतिहासिक ज़िम्मेदारी और अलग–अलग ज़िम्मेदारियों पर आधारित होनी चाहिए। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) द्वारा आयोजित “पर्यावरण और जलवायु गतिशीलता का भविष्य” (The Future of Environment and Climate Dynamics) विषय पर एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में प्रधानमंत्री ने इस बात पर ज़ोर दिया।
यह चर्चा एंटाल्या, तुर्की में होने वाले COP31 से पहले महत्वपूर्ण है। भारत का मानना है कि जलवायु संरक्षण और आर्थिक विकास को एक-दूसरे के विरोधी लक्ष्यों के बजाय साथ-साथ आगे बढ़ना चाहिए।
उत्सर्जन का असमान वितरण
भारत ने प्रति व्यक्ति और कुल कार्बन उत्सर्जन, दोनों में बड़े अंतर की ओर इशारा किया है। भारत का सालाना प्रति व्यक्ति उत्सर्जन लगभग 2.2 टन है, जबकि वैश्विक औसत लगभग 4.7 टन है।
मुख्य रूप से उत्सर्जन करने वाले देशों के आंकड़े काफी ज़्यादा हैं। अमेरिका में प्रति व्यक्ति उत्सर्जन लगभग 14.2 टन और रूस में 14 टन है, जो विकसित और विकासशील अर्थव्यवस्थाओं के बीच बड़े अंतर को दिखाता है।
स्टैटिक GK तथ्य: प्रति व्यक्ति उत्सर्जन का मतलब है कुल उत्सर्जन को आबादी से भाग देना। इस पैमाने का इस्तेमाल अक्सर जलवायु वार्ताओं में देशों के बीच उत्सर्जन के सापेक्ष बोझ की तुलना करने के लिए किया जाता है।
भारत ने ऐतिहासिक उत्सर्जन के महत्व पर भी प्रकाश डाला है। 1751-2024 के दौरान, वैश्विक कार्बन उत्सर्जन में भारत का कुल योगदान लगभग 3.5% अनुमानित है, जबकि अमेरिका का 23.5%, चीन का 15.4%, रूस का 6.6%, जर्मनी का 5.1% और यूनाइटेड किंगडम का 4.3% है।
भारत की जलवायु कार्रवाई
भारत का तर्क है कि उसकी जलवायु प्रतिबद्धताओं के साथ-साथ उसकी विकास संबंधी ज़रूरतों पर भी विचार किया जाना चाहिए। साथ ही, देश ने नवीकरणीय ऊर्जा, स्वच्छ परिवहन, विद्युतीकरण और ऊर्जा दक्षता से जुड़े कई उपाय किए हैं।
भारत की सौर ऊर्जा क्षमता में ज़बरदस्त बढ़ोतरी हुई है, जो 2012 में लगभग 2 GW थी और अब लगभग 160 GW हो गई है। PM-KUSUM योजना के तहत, लगभग 30 लाख किसानों को सोलर पंप मिले हैं, जिससे कृषि में विकेंद्रीकृत नवीकरणीय ऊर्जा को बढ़ावा मिला है। ‘वन नेशन वन ग्रिड‘ पहल से अनुमानित 200 मिलियन टन कार्बन उत्सर्जन को रोकने में मदद मिली है। पवन और जलविद्युत क्षमता के साथ-साथ रूफटॉप और विकेंद्रीकृत सोलर इंस्टॉलेशन का भी विस्तार हुआ है।
साफ़–सुथरा ट्रांसपोर्ट और इंफ्रास्ट्रक्चर
भारत में साफ़–सुथरी गतिशीलता (clean-mobility) की ओर बदलाव तेज़ हुआ है; इलेक्ट्रिक वाहनों की सालाना बिक्री 2014 में लगभग 3,000 से बढ़कर पिछले साल लगभग 25 लाख हो गई है।
मेट्रो रेल का विस्तार भी हुआ है – 2014 से पहले पाँच शहरों में 250 किलोमीटर से कम नेटवर्क था, जो अब 20 शहरों में 1,000 किलोमीटर से ज़्यादा हो गया है। इसके अलावा, देश ने ट्रांसपोर्ट की क्षमता बढ़ाने और ईंधन की खपत कम करने के लिए रेलवे के विद्युतीकरण, इनलैंड वॉटरवे (आंतरिक जलमार्ग) और डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर (माल ढुलाई के लिए समर्पित कॉरिडोर) पर भी काम किया है।
स्टैटिक GK टिप: डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर (DFCs) खास तौर पर माल ढुलाई के लिए बनाए गए रेलवे रूट हैं। ये लंबी और भारी मालगाड़ियों को चलाने में मदद करते हैं और लॉजिस्टिक्स की क्षमता में सुधार करते हैं।
विकास और पर्यावरण संरक्षण
कॉन्फ़्रेंस में इस बात पर ज़ोर दिया गया कि पर्यावरण संरक्षण का आर्थिक विकास के विरोध में होना ज़रूरी नहीं है। भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि बहस अब “संरक्षण बनाम विकास“ से आगे बढ़कर दोनों के बीच तालमेल बिठाने के तरीकों को खोजने की ओर बढ़ रही है।
इस व्यापक नज़रिए में पर्यावरण की गुणवत्ता को इंसानी भलाई और जलवायु से जुड़े अधिकारों से भी गहराई से जुड़ा हुआ माना जाता है। केंद्रीय पर्यावरण मंत्री ने भी टिकाऊ और गैर–टिकाऊ विकास के बीच अंतर पर ज़ोर दिया।
भारत के संरक्षण प्रयासों में बाघों, हाथियों, शेरों, ग्रेट इंडियन बस्टर्ड और गिद्धों के लिए कार्यक्रम शामिल हैं, साथ ही व्यापक स्तर पर जैव–विविधता का संरक्षण भी किया जा रहा है।
COP31 से पहले भारत
उम्मीद है कि भारत जलवायु न्याय, ऐतिहासिक ज़िम्मेदारी और मौजूदा वादों को पूरा करने की वकालत जारी रखेगा। यह जलवायु से जुड़े आर्थिक और पर्यावरणीय दबावों का सामना कर रहे कमज़ोर विकासशील देशों पर ज़्यादा ध्यान देने पर भी ज़ोर देता है।
जलवायु-जनित आपदाओं से प्रभावित विकासशील देशों के लिए ‘लॉस एंड डैमेज फंड‘ (LDF) बहुत महत्वपूर्ण है। इसलिए, भारत की जलवायु कूटनीति में घरेलू स्तर पर साफ़–सुथरी ऊर्जा का विस्तार और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जलवायु से जुड़ी ज़िम्मेदारियों के समान बंटवारे की मांग, दोनों शामिल हैं।
उस्तादियन करेंट अफेयर्स स्थिर तालिका
| तथ्य | विवरण |
| मुख्य सिद्धांत | जलवायु समानता |
| भारत का प्रति व्यक्ति उत्सर्जन | लगभग 2.2 टन प्रतिवर्ष |
| वैश्विक प्रति व्यक्ति उत्सर्जन | लगभग 4.7 टन प्रतिवर्ष |
| भारत की संचयी उत्सर्जन हिस्सेदारी | 1751–2024 के दौरान लगभग 3.5% |
| अमेरिका की संचयी उत्सर्जन हिस्सेदारी | लगभग 23.5% |
| भारत की सौर ऊर्जा क्षमता | लगभग 160 GW |
| PM-KUSUM लाभार्थी | लगभग 30 लाख किसान |
| वन नेशन वन ग्रिड | अनुमानित 200 मिलियन टन उत्सर्जन से बचाव |
| वार्षिक EV बिक्री | लगभग 25 लाख |
| मेट्रो रेल नेटवर्क | 20 शहरों में 1,000 किमी से अधिक |
| प्रमुख अंतरराष्ट्रीय पहल | इंटरनेशनल सोलर अलायंस, ग्लोबल बायोफ्यूल अलायंस, इंटरनेशनल बिग कैट अलायंस |
| COP31 स्थल | अंताल्या, तुर्किये |
| प्रमुख जलवायु वित्त तंत्र | लॉस एंड डैमेज फंड |





