किफायती काउंटर–ड्रोन सिस्टम क्यों महत्वपूर्ण हैं?
आधुनिक युद्ध में अब सस्ते अनमैन्ड एरियल व्हीकल (UAV) का इस्तेमाल बढ़ गया है, जो बचाव करने वालों (डिफेंडर्स) पर भारी आर्थिक बोझ डाल सकते हैं। जब एक बहुत ही सस्ते ड्रोन को रोकने के लिए एक बहुत महंगी मिसाइल का इस्तेमाल किया जाता है, तो बचाव करने वाला पक्ष खतरे को तो खत्म कर देता है, लेकिन उसे आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है।
इसे ‘कॉस्ट एसिमेट्री‘ (लागत में असंतुलन) कहा जाता है। इस वजह से ऐसे किफायती इंटरसेप्टर (रोकने वाले सिस्टम) की मांग बढ़ गई है, जो रक्षा बजट पर अतिरिक्त बोझ डाले बिना सैन्य ठिकानों, सैनिकों और महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे की सुरक्षा कर सकें।
स्टैटिक GK तथ्य: UAV ऐसे विमान होते हैं जिन्हें दूर से (रिमोट द्वारा) या खुद (ऑटोनॉमस तरीके से) संचालित किया जाता है, और इनमें कोई मानव पायलट नहीं होता। काउंटर-UAS सिस्टम को अनमैन्ड विमानों से जुड़े खतरों का पता लगाने, उन्हें ट्रैक करने और बेअसर करने के लिए डिज़ाइन किया गया है।
ज्वाला-MK1 क्या है?
ज्वाला-MK1 एक शॉर्ट-रेंज (कम दूरी की) सरफेस-टू-एयर मिसाइल है, जिसे भारतीय रक्षा तकनीक कंपनी ‘IG डिफेंस‘ ने विकसित किया है। रिपोर्ट के अनुसार, इस सिस्टम का मुख्य उद्देश्य पारंपरिक और महंगे हवाई लक्ष्यों के बजाय, दुश्मन के ड्रोन को रोकना है।
इस मिसाइल को मई 2026 में प्रयागराज में आयोजित ‘नॉर्थ टेक संगोष्ठी‘ (North Tech Symposium) में सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित किया गया था। इसकी मारक क्षमता (रेंज) 2 से 5 किमी बताई गई है, और यह 50 मीटर से लेकर 5,000 मीटर की ऊंचाई तक काम कर सकती है।
ज्वाला में सॉलिड–फ्यूल डुअल–पल्स रॉकेट मोटर का इस्तेमाल किया गया है, जिसे उड़ान के दो चरणों के दौरान थ्रस्ट (गति) देने के लिए डिज़ाइन किया गया है। बताया गया है कि डेवलपर्स ने दो सॉलिड रॉकेट मोटरों का सफल परीक्षण किया है, जो प्रोपल्शन सिस्टम को जोड़ने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
स्टैटिक GK टिप: सरफेस–टू–एयर मिसाइलें (SAMs) ज़मीन से हवा में मौजूद लक्ष्यों को निशाना बनाने के लिए दागी जाती हैं। इनकी क्षमताएं रेंज, गाइडेंस, ऊंचाई की कवरेज और लक्ष्य की विशेषताओं जैसे कारकों पर निर्भर करती हैं।
विकास और एकीकरण
ज्वाला के लिए अभी पूरे सिस्टम का फ्लाइट ट्रायल, गाइडेंस और कंट्रोल का सत्यापन, अलग–अलग तरह के लक्ष्यों पर परीक्षण और विश्वसनीयता का आकलन होना बाकी है। इसे ऑपरेशनल रूप से तैनात करने के लिए, कमांड–एंड–कंट्रोल सिस्टम के साथ इसका एकीकरण भी बहुत महत्वपूर्ण होगा। IG डिफेंस, ‘ज्वाला‘ को अपने ‘GRID’ बैटल–मैनेजमेंट आर्किटेक्चर से जोड़ने की योजना बना रहा है। इसका उद्देश्य सेंसर, खतरे का आकलन और रक्षात्मक प्रतिक्रियाओं को एक साथ जोड़ना है। इससे केवल एक इंटरसेप्टर पर निर्भर रहने के बजाय, एक एकीकृत काउंटर–ड्रोन समाधान तैयार करने में मदद मिल सकती है।
हालाँकि, हर सफल इंटरसेप्शन (दुश्मन के ड्रोन को रोकने) की वास्तविक लागत अभी निश्चित रूप से तय नहीं की जा सकती है। खरीद की लागत, इंटरसेप्शन का प्रदर्शन और वास्तविक परिचालन स्थितियों में इसकी विश्वसनीयता की स्वतंत्र रूप से जांच होनी चाहिए।
भारत का रक्षा विनिर्माण इकोसिस्टम
भारत का बढ़ता रक्षा उद्योग, निजी क्षेत्र के लिए काउंटर–ड्रोन तकनीक विकसित करने का एक व्यापक आधार प्रदान करता है। रिपोर्ट के अनुसार, वित्त वर्ष 2025-26 में रक्षा उत्पादन 1.78 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया, जिसमें निजी कंपनियों का योगदान लगभग 42,000 करोड़ रुपये (यानी 24%) रहा। इसी अवधि में रक्षा निर्यात 38,424 करोड़ रुपये तक पहुंच गया।
रक्षा विनिर्माण और तकनीक के क्षेत्र में काम करने वाली अन्य कंपनियों में सोलर इंडस्ट्रीज इंडिया, अडानी डिफेंस एंड एयरोस्पेस, NIBE ग्रुप, लार्सन एंड टुब्रो (L&T) और पारस डिफेंस एंड स्पेस टेक्नोलॉजीज शामिल हैं। रिपोर्ट में ‘गार्जियन-1′ काउंटर–ड्रोन इंटरसेप्टर को लेकर पारस डिफेंस और अमेरिकी कंपनी ‘पावरस‘ के बीच साझेदारी का भी जिक्र है।
स्टैटिक GK तथ्य: रक्षा मंत्रालय स्वदेशी रक्षा विकास को बढ़ावा देने के लिए कई पहल करता है। इनमें घरेलू विनिर्माण, निजी क्षेत्र की भागीदारी, स्टार्टअप्स और सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों (MSMEs) को प्रोत्साहित करना शामिल है।
चुनौतियां और रणनीतिक महत्व
‘ज्वाला‘ की दीर्घकालिक सफलता तीन कारकों पर निर्भर करेगी: भरोसेमंद इंटरसेप्शन, किफायती लाइफसाइकिल लागत और बड़े पैमाने पर उत्पादन। कम लागत वाली मिसाइल को अपने लक्षित खतरों के खिलाफ पर्याप्त सटीकता और विश्वसनीयता भी हासिल करनी होगी।
किफायती इंटरसेप्टर पारंपरिक एयर–डिफेंस सिस्टम पर दबाव कम कर सकते हैं और महत्वपूर्ण प्रतिष्ठानों की सुरक्षा को अधिक टिकाऊ बना सकते हैं। फिर भी, बाजार के अनुमानों या शुरुआती तकनीकी उपलब्धियों को ही परिचालन प्रभावशीलता का पक्का सबूत नहीं माना जाना चाहिए।
भारत की काउंटर–ड्रोन महत्वाकांक्षाएं अंततः कठोर परीक्षण, स्वदेशी सप्लाई चेन और व्यापक एयर–डिफेंस नेटवर्क के साथ इसके एकीकरण पर निर्भर करेंगी।
स्थिर उस्तादियन करेंट अफेयर्स तालिका
| तथ्य | विवरण |
| प्रणाली | ज्वाला-एमके1 ड्रोन-रोधी इंटरसेप्टर |
| विकासकर्ता | आईजी डिफेंस |
| सार्वजनिक प्रदर्शन | नॉर्थ टेक संगोष्ठी, प्रयागराज, मई 2026 |
| रिपोर्ट के अनुसार लक्ष्य भेदन की सीमा | 2–5 किलोमीटर |
| रिपोर्ट के अनुसार ऊँचाई की सीमा | 50 मीटर से 5,000 मीटर |
| प्रणोदन प्रणाली | ठोस ईंधन वाला दोहरे पल्स का रॉकेट मोटर |
| प्रस्तावित एकीकरण | ग्रिड (GRID) युद्ध प्रबंधन संरचना |
| मुख्य चुनौती | टिकाऊ लागत पर विश्वसनीय लक्ष्य अवरोधन |
| संबंधित तकनीक | ड्रोन-रोधी प्रणाली और सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइल प्रणालियाँ |
| रक्षा नीति में प्रासंगिकता | स्वदेशी उत्पादन और निजी क्षेत्र की भागीदारी |





