मामले की पृष्ठभूमि
भारत के सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में पितृत्व अवकाश को एक सामाजिक सुरक्षा लाभ के रूप में मान्यता देने की आवश्यकता पर ज़ोर दिया। यह टिप्पणी हमसानंदिनी नंदूरी बनाम भारत संघ (2026) मामले में की गई थी।
कोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया कि बच्चों की परवरिश एक साझा ज़िम्मेदारी है, और बच्चों की शुरुआती देखभाल के दौरान पिता की अनुपस्थिति को सामान्य नहीं माना जा सकता। इसने उन पारंपरिक मान्यताओं पर सवाल उठाए जो बच्चों की देखभाल की पूरी ज़िम्मेदारी केवल माँ पर डाल देती हैं।
स्टैटिक GK तथ्य: भारत के सुप्रीम कोर्ट की स्थापना 1950 में संविधान के अनुच्छेद 124 के तहत की गई थी।
पितृत्व अवकाश की अवधारणा
पितृत्व अवकाश से तात्पर्य उस छुट्टी की अवधि से है जो किसी बच्चे के जन्म या गोद लेने के बाद पिता को दी जाती है। यह उन्हें माँ का सहयोग करने और बच्चों की शुरुआती देखभाल में सक्रिय रूप से भाग लेने का अवसर देता है।
भारत में, पितृत्व अवकाश को अनिवार्य बनाने वाला कोई सर्वव्यापी कानून नहीं है। हालाँकि, केंद्रीय सिविल सेवा (अवकाश) नियमों के तहत, पुरुष सरकारी कर्मचारियों को 15 दिनों के पितृत्व अवकाश का अधिकार प्राप्त है।
प्रस्तावित ‘पितृत्व और माता–पिता लाभ विधेयक, 2025‘ में 8 सप्ताह के अवकाश का सुझाव दिया गया है, लेकिन यह अभी भी एक ‘निजी सदस्य विधेयक (Private Member Bill)‘ ही बना हुआ है और अभी तक कानून का रूप नहीं ले पाया है।
कानूनी मान्यता की आवश्यकता
कोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया कि बच्चों की परवरिश में भावनात्मक और शारीरिक, दोनों तरह की समान ज़िम्मेदारी शामिल होती है। पिता को पर्याप्त अवकाश न देना, लैंगिक भूमिकाओं से जुड़ी पुरानी मान्यताओं को ही और मज़बूत करता है।
कोर्ट ने “अदृश्य अन्याय” की अवधारणा की ओर भी इशारा किया, जिसके तहत समाज माँ को ही बच्चों की देखभाल करने वाली मुख्य व्यक्ति के रूप में सामान्य मान लेता है। यह मानसिकता पिता की भी उतनी ही महत्वपूर्ण भूमिका को मान्यता मिलने में बाधक बनती है।
पितृत्व अवकाश से बच्चों के कल्याण में भी सुधार होता है, क्योंकि बच्चों के विकास के शुरुआती वर्षों में माता–पिता, दोनों की उपस्थिति उनके लिए लाभकारी सिद्ध होती है।
स्टैटिक GK सुझाव: संविधान के अनुच्छेद 41 के तहत वर्णित ‘राज्य के नीति निदेशक तत्व (DPSP)‘, मातृत्व और सामाजिक सुरक्षा जैसे मामलों में सार्वजनिक सहायता को बढ़ावा देते हैं।
कार्यान्वयन में चुनौतियाँ
एक बड़ी चुनौती, सामाजिक सोच में बदलाव लाने की आवश्यकता है। कई पुरुष सामाजिक कलंक और कार्यस्थल पर लोगों की सोच के कारण पितृत्व अवकाश लेने में हिचकिचाते हैं।
इसके अलावा, करियर में पिछड़ने का डर भी बना रहता है, विशेष रूप से प्रतिस्पर्धी निजी क्षेत्रों में। कर्मचारियों को यह चिंता सताती है कि लंबे समय तक छुट्टी पर रहने से उनके प्रमोशन और नौकरी की सुरक्षा पर बुरा असर पड़ सकता है।
एक और मुद्दा भारत का विशाल ‘अनौपचारिक कार्यबल (informal workforce)‘ है, जो औपचारिक श्रम कानूनों के दायरे से बाहर रहता है। इस तरह के फ़ायदे सभी को देना मुश्किल हो जाता है।
वैश्विक दृष्टिकोण
स्वीडन जैसे देश प्रगतिशील मॉडल पेश करते हैं, जिसमें माता–पिता के बीच बांटी जाने वाली 480 दिनों तक की सवैतनिक पैतृक छुट्टी दी जाती है। ऐसी नीतियां लैंगिक समानता और संतुलित पालन–पोषण को बढ़ावा देती हैं।
भारत भी लचीली और समावेशी पैतृक छुट्टी नीतियों को सुनिश्चित करके ऐसे ही मॉडल अपना सकता है। यह श्रम कल्याण के वैश्विक मानकों के अनुरूप होगा।
आगे की राह
पितृत्व अवकाश को एक सामाजिक सुरक्षा अधिकार के रूप में मान्यता देने से सामाजिक मानदंड बदल सकते हैं और पारिवारिक ढांचे मज़बूत हो सकते हैं। इससे लैंगिक समानता को बढ़ावा मिलेगा और बच्चों के विकास के परिणाम बेहतर होंगे।
कानूनी समर्थन के साथ-साथ जागरूकता और कार्यस्थल में सुधार भी ज़रूरी हैं। यह कदम भारत में पारंपरिक भूमिकाओं से हटकर साझा पालन–पोषण की ज़िम्मेदारी की ओर बदलाव का संकेत हो सकता है।
Static Usthadian Current Affairs Table
| विषय | विवरण |
| मामले का नाम | हमसानंदिनी नंदूरी बनाम भारत संघ |
| न्यायालय की टिप्पणी | पितृत्व अवकाश को सामाजिक सुरक्षा लाभ के रूप में माना गया |
| वर्तमान नियम | केंद्र सरकार कर्मचारियों के लिए 15 दिन |
| प्रस्तावित कानून | पितृत्व एवं अभिभावकीय लाभ विधेयक, 2025 |
| प्रस्तावित अवकाश | 8 सप्ताह |
| मुख्य मुद्दा | पालन-पोषण में लैंगिक भूमिकाएँ |
| प्रमुख चुनौती | असंगठित क्षेत्र का बहिष्करण |
| वैश्विक उदाहरण | स्वीडन का अभिभावकीय अवकाश मॉडल |
| संवैधानिक संबंध | अनुच्छेद 41 (राज्य के नीति निदेशक तत्व) |
| उद्देश्य | साझा पालन-पोषण और बाल कल्याण को बढ़ावा |





