गोद लेने वाली माताओं पर ऐतिहासिक फैसला
भारत के सुप्रीम कोर्ट ने गोद लेने वाली माताओं के लिए मातृत्व अवकाश पर लगी उम्र की पाबंदी को हटा दिया है, और पहले के प्रावधान को असंवैधानिक घोषित कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि सभी गोद लेने वाली माताएं 12 हफ़्ते के मातृत्व अवकाश की हकदार हैं, चाहे गोद लेते समय बच्चे की उम्र कुछ भी हो।
यह फैसला ‘हम्सा नंदिनी नंदुरी बनाम भारत संघ (2026)’ मामले में आया। यह भारतीय कानून के तहत गोद लेने को जैविक माता–पिता होने के बराबर मान्यता देने की दिशा में एक अहम कदम है।
स्टेटिक GK तथ्य: सुप्रीम कोर्ट भारत की सबसे बड़ी न्यायिक संस्था है, जिसकी स्थापना संविधान के अनुच्छेद 124 के तहत की गई है।
भेदभावपूर्ण प्रावधान को रद्द करना
कोर्ट ने सामाजिक सुरक्षा संहिता 2020 की धारा 60(4) को अमान्य घोषित कर दिया, जो पहले मातृत्व लाभ को केवल तीन महीने से कम उम्र के बच्चों को गोद लेने वाली माताओं तक ही सीमित रखती थी। इस पाबंदी के कारण बड़ी संख्या में गोद लेने वाले माता–पिता इस लाभ से वंचित रह जाते थे।
फैसले में कहा गया कि इस तरह का वर्गीकरण अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 21 (जीवन और गरिमा का अधिकार) का उल्लंघन करता है। कोर्ट ने इस प्रावधान को मनमाना और बिना किसी तार्किक आधार वाला बताया।
स्टेटिक GK टिप: अनुच्छेद 14 सभी नागरिकों के लिए कानून के समक्ष समानता और कानूनों की समान सुरक्षा सुनिश्चित करता है।
देखभाल और जुड़ाव को मान्यता
कोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया कि मातृत्व केवल बच्चे को जन्म देने तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसमें भावनात्मक जुड़ाव, देखभाल और पालन–पोषण भी शामिल है। गोद लेने की प्रक्रिया में माता–पिता और बच्चे, दोनों को ही तालमेल बिठाने के लिए बराबर, और शायद उससे भी ज़्यादा समय की ज़रूरत होती है।
कोर्ट ने कहा कि बड़े बच्चों को गोद लेने वाली माताओं को छुट्टी न देना, बच्चों के विकास और परिवार के एकीकरण पर बुरा असर डालता है। इसलिए, मातृत्व अवकाश बच्चे के सर्वोत्तम हितों को ध्यान में रखते हुए दिया जाना चाहिए।
स्टेटिक GK तथ्य: “बच्चे के सर्वोत्तम हित“ की अवधारणा, ‘बाल अधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन (1989)’ जैसे अंतर्राष्ट्रीय समझौतों का एक मुख्य सिद्धांत है।
गोद लेने वाली और सरोगेट माताओं के लिए इसके निहितार्थ
इस फैसले से यह सुनिश्चित होता है कि गोद लेने वाली और सरोगेट (कमीशनिंग) माताएं, दोनों को ही मातृत्व के समान लाभ मिलें। 12 हफ़्ते की छुट्टी की अवधि उस तारीख से शुरू होगी, जिस तारीख को बच्चा उन्हें सौंपा जाएगा। इससे एक बड़ी कानूनी कमी दूर होती है, जिससे मातृत्व लाभ ज़्यादा समावेशी और आधुनिक पारिवारिक ढांचों के अनुरूप हो जाते हैं।
यह फ़ैसला सामाजिक न्याय और लैंगिक समानता के प्रति भारत की प्रतिबद्धता को भी मज़बूत करता है।
पितृत्व अवकाश में सुधार की मांग
इस फ़ैसले के अलावा, कोर्ट ने सरकार से सामाजिक सुरक्षा ढांचे के तहत पितृत्व अवकाश शुरू करने का आग्रह किया। कोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया कि देखभाल की ज़िम्मेदारी सिर्फ़ माँओं पर ही नहीं होनी चाहिए।
पितृत्व अवकाश को मान्यता देने से साझा पालन–पोषण को बढ़ावा मिलेगा, लैंगिक भेदभाव कम होगा और परिवार का समग्र कल्याण बेहतर होगा।
स्टेटिक GK टिप: भारत में फ़िलहाल निजी क्षेत्र में पितृत्व अवकाश के लिए कोई सार्वभौमिक वैधानिक प्रावधान नहीं है।
आगे की राह
यह फ़ैसला संवैधानिक अधिकारों की एक प्रगतिशील व्याख्या को दर्शाता है और माता–पिता के कल्याण से जुड़ी नीतियों में वैश्विक रुझानों के अनुरूप है। यह मातृत्व लाभों के दायरे को विस्तृत करता है और गोद लेने की प्रक्रिया को कानूनी मान्यता प्रदान करता है।
भविष्य में, भारत में समावेशी और न्यायसंगत पारिवारिक सहायता प्रणालियों को सुनिश्चित करने के लिए माता–पिता के अवकाश से जुड़ी नीतियों में विधायी सुधार अत्यंत महत्वपूर्ण होंगे।
Static Usthadian Current Affairs Table
| विषय | विवरण |
| मामले का नाम | हम्सानंदिनी नंदूरी बनाम भारत संघ (2026) |
| प्रमुख संस्था | भारत का सर्वोच्च न्यायालय |
| निरस्त किया गया प्रावधान | सामाजिक सुरक्षा संहिता 2020 की धारा 60(4) |
| अवकाश अवधि | 12 सप्ताह का मातृत्व अवकाश |
| प्रमुख संवैधानिक अनुच्छेद | अनुच्छेद 14 और अनुच्छेद 21 |
| लाभार्थी | दत्तक माताएँ और कमीशनिंग माताएँ |
| मुख्य सिद्धांत | समानता और बाल कल्याण |
| अतिरिक्त सुझाव | पितृत्व अवकाश की शुरुआत |





