बढ़ती पहचान
अम्बाजी मार्बल को वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के DPIIT द्वारा प्रदान किए गए भौगोलिक संकेत (GI) टैग के बाद वैश्विक स्तर पर व्यापक पहचान मिली है। यह प्रमाणन इसकी उस विशिष्ट पहचान की रक्षा करता है जो उत्तर गुजरात के बनासकांठा जिले में विशेष रूप से पाए जाने वाले दुर्लभ और उच्च-मूल्य संगमरमर को परिभाषित करती है।
जीआई प्रमाणन इसकी प्रामाणिकता को मजबूत करता है और भारत की सांस्कृतिक और आर्थिक प्रणाली में इसकी भूमिका को और सशक्त बनाता है।
प्राचीन उत्पत्ति
अम्बाजी संगमरमर की विरासत लगभग 1200–1500 वर्ष पुरानी मानी जाती है और यह भारत की ऐतिहासिक मंदिर वास्तुकला से जुड़ी है।
यह वही संगमरमर है जिसका संबंध माउंट आबू के प्रसिद्ध दिलवाड़ा जैन मंदिरों के निर्माण काल से माना जाता है। ये मंदिर अपनी उत्कृष्ट कारीगरी और सूक्ष्म मार्बल नक्काशी के लिए विश्वभर में प्रशंसित हैं, जो अम्बाजी पत्थर की ऐतिहासिक प्रतिष्ठा को स्थापित करते हैं।
Static GK fact: दिलवाड़ा मंदिरों का निर्माण 11वीं से 13वीं शताब्दी के बीच हुआ और ये अपनी संगमरमर नक्काशी के लिए प्रसिद्ध हैं।
विशिष्ट विशेषताएँ
अम्बाजी संगमरमर अपनी दूधिया सफेद रंगत के लिए दुनिया भर में सराहा जाता है, जो इसे अन्य संगमरमर किस्मों से अलग बनाता है।
इसमें उच्च कैल्शियम सामग्री, प्राकृतिक चमक, चिकनी बनावट और मजबूत टिकाऊपन होता है, जो इसे पवित्र व वास्तु महत्व वाले निर्माणों के लिए अत्यंत उपयुक्त बनाता है।
राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय दोनों बाजारों में इसकी मांग इसे प्रीमियम श्रेणी का प्राकृतिक पत्थर बनाती है।
Static GK Tip: भारत प्राकृतिक पत्थरों का वैश्विक स्तर पर प्रमुख उत्पादक है, जिसमें राजस्थान और गुजरात का योगदान सबसे अधिक है।
वैश्विक उपस्थिति का विस्तार
अम्बाजी संगमरमर का उपयोग गुजरात तक सीमित नहीं है। माना जाता है कि इसका उपयोग अयोध्या के राम मंदिर निर्माण में भी हुआ है, जो इसकी आध्यात्मिक प्रासंगिकता को दर्शाता है।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस पत्थर का उपयोग मियामी, लॉस एंजेलिस, बोस्टन जैसे शहरों और न्यूजीलैंड व इंग्लैंड जैसे देशों में बने मंदिरों और सांस्कृतिक ढांचों में किया गया है।
यह इसकी बढ़ती वैश्विक मांग का प्रमाण है।
Static GK fact: अयोध्या राम मंदिर भारत के सबसे बड़े आधुनिक मंदिर परियोजनाओं में से एक है, जिसका उद्घाटन 2024 में हुआ।
जीआई टैग का महत्व
जीआई टैग अम्बाजी संगमरमर को नकल और अवैध उपयोग से बचाता है।
अब केवल अम्बाजी क्षेत्र से निकाले गए संगमरमर को ही इस नाम से बेचा जा सकता है।
यह प्रमाणन खरीदारों को गुणवत्ता और प्रामाणिकता का भरोसा देता है और इसके निर्यात संभावनाओं को भी बढ़ाता है।
स्थानीय समुदायों के लिए यह टैग आय, रोजगार और पारंपरिक कारीगरी को वैश्विक पहचान देने में मदद करता है।
बनासकांठा का संगमरमर उद्योग सैकड़ों खनिकों, कारीगरों और प्रोसेसरों को आजीविका प्रदान करता है, जिससे यह उपलब्धि आर्थिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण है।
Static GK Tip: भारत का पहला जीआई टैग 2004 में दार्जिलिंग टी को मिला था।
सांस्कृतिक और आर्थिक महत्व
अम्बाजी संगमरमर विरासत, शिल्प और आर्थिक अवसरों का अनोखा संगम है।
इसकी नई जीआई मान्यता गुजरात को उच्च-गुणवत्ता वाले प्राकृतिक पत्थरों के केंद्र के रूप में और मजबूत करती है।
इसके साथ ही यह भारत के उस व्यापक प्रयास को आगे बढ़ाता है जो पारंपरिक उत्पादों की सुरक्षा और उन्हें वैश्विक मंच पर प्रस्तुत करने के लिए किया जा रहा है।
स्टैटिक उस्तादियन करंट अफेयर्स टेबल
| विषय | विवरण |
| उत्पाद | अम्बाजी संगमरमर |
| मूल स्थान | बनासकांठा जिला, गुजरात |
| प्रमाणन | जीआई टैग |
| जारी करने वाली प्राधिकरण | DPIIT |
| मुख्य विशेषता | दूधिया सफेद, टिकाऊ उच्च-गुणवत्ता संगमरमर |
| ऐतिहासिक संबंध | दिलवाड़ा जैन मंदिरों में उपयोग |
| हाल का उपयोग | अयोध्या राम मंदिर से संबद्ध |
| वैश्विक उपस्थिति | अमेरिका, न्यूजीलैंड, इंग्लैंड |
| आर्थिक प्रभाव | निर्यात में वृद्धि और कारीगरों की आजीविका को समर्थन |
| श्रेणी | प्राकृतिक भूवैज्ञानिक उत्पाद |





