सूक्ष्म-वित्त का अवलोकन
सूक्ष्म-वित्त उन कम आय वाले व्यक्तियों/समूहों को बैंकिंग सेवाएँ उपलब्ध कराता है जिन्हें पारंपरिक बैंकिंग तक पहुँच नहीं है। इसका उद्देश्य वित्तीय समावेशन है और यह हाशिये पर खड़े वर्गों को लक्षित करता है।
माइक्रो लेंडिंग संस्थानों (MLIs) की ग्रामीण पहुँच गहरी है—71% ग्राहक ग्रामीण क्षेत्रों में रहते हैं।
स्थैतिक जीके तथ्य: भारत में पहली माइक्रोफाइनेंस संस्थाएँ 1990 के दशक की शुरुआत में ग्रामीण ऋण अंतर (credit gap) को भरने के लिए उभरीं।
महिला-नेतृत्व वाली स्वयं सहायता समूहों (SHGs) की भूमिका निर्णायक रही है—बैंक-लिंक्ड SHGs में 88% महिलाएँ नेतृत्व करती हैं, जिससे सामाजिक-आर्थिक सशक्तिकरण को बढ़ावा मिला है।
ऋण डिलिंक्वेंसी (चूक) में बढ़ोतरी
सा-धन की FY 2024–25 की नवीनतम त्रैमासिक माइक्रोफाइनेंस रिपोर्ट में डिलिंक्वेंसी में तेज उछाल दर्ज हुआ है। पोर्टफोलियो-एट-रिस्क (PAR) के ऊँचे स्तर सभी बकेट्स में एसेट क्वालिटी के बिगड़ने की ओर संकेत करते हैं। प्रमुख कारण: ग्रामीण संकट, मौसमीय झटके, और सीमित वित्तीय साक्षरता।
बिहार ने सबसे अधिक डिलिंक्वेंसी दर्ज की—सबसे बड़ा बकाया पोर्टफोलियो और उच्चतम डिफॉल्ट दरें यहीं से आईं।
स्थैतिक जीके तथ्य: PAR > 30 दिन वैश्विक स्तर पर माइक्रोफाइनेंस एसेट क्वालिटी मापने का मानक संकेतक है।
परिचालन और वित्तीय चुनौतियाँ
संस्थाएँ स्टाफ और क्लाइंट रिटेंशन में कठिनाई, घटती जनशक्ति, और सेवा-प्रदाय पर असर रिपोर्ट कर रही हैं।
फंडिंग लागत बढ़कर औसत 11.33% (Weighted Average Cost of Funds) तक पहुँच गई है—इसका छोटे MLIs पर खासा असर पड़ा है।
लाभप्रदता घटी है—Return on Equity (RoE) < 1% रिपोर्ट करने वाले MLIs की संख्या उल्लेखनीय रूप से बढ़ी है।
स्थैतिक जीके टिप: माइक्रोफाइनेंस संस्थाएँ इक्विटी + थोक ऋण (wholesale funding) के मिश्रण पर निर्भर रहती हैं, इसलिए ब्याज दरों में बदलाव के प्रति संवेदनशील होती हैं।
सरकारी पहलें
- SHG–Bank Linkage Programme: गैर-आय सृजन गतिविधियों से उत्पादन-आधारित ऋण की ओर संक्रमण को प्रोत्साहन; क्रेडिट वॉल्यूम बढ़ता है।
- प्रधानमंत्री मुद्रा योजना (PMMY): सूक्ष्म-उद्यमों को बिना जमानत माइक्रो-क्रेडिट उपलब्ध कराती है।
- NABARD Refinance Support: MFIs को दीर्घकालिक रिफाइनेंस देकर तरलता और परिचालन स्थिरता में सहायता।
आगे की वृद्धि के लिए डिजिटल अपनाने, मजबूत अंडरराइटिंग, और उत्तरदायी ऋण-प्रदान महत्वपूर्ण रहेंगे।
स्थैतिक जीके तथ्य: नाबार्ड (NABARD) की स्थापना 1982 में सतत ग्रामीण विकास हेतु क्रेडिट और अन्य सुविधाएँ बढ़ाने के लिए हुई थी।
आगे की राह
टिकाऊ वृद्धि के लिए वित्तीय समावेशन और सावधान जोखिम-प्रबंधन में संतुलन ज़रूरी है। प्राथमिकताएँ:
- डिजिटल अपनाने का विस्तार (KYC/ई-KYC, संग्रहण/रीपेमेंट डिजिटल)
- रीपेमेंट मॉनिटरिंग और कलेक्शंस का उन्नत विश्लेषण (PAR-आधारित अर्ली वार्निंग)
- नीतिगत समर्थन के साथ ग्रामीण क्रेडिट पैठ बढ़ाना और डिलिंक्वेंसी घटाना
स्थैतिक “Usthadian” वर्तमान घटनाओं की सारणी
| विषय | विवरण |
| रिपोर्टिंग निकाय | सा-धन (Sa-Dhan) |
| रिपोर्ट प्रकार | त्रैमासिक माइक्रोफाइनेंस रिपोर्ट (वार्षिक भारत माइक्रोफाइनेंस रिपोर्ट का हिस्सा) |
| आच्छादित FY | 2024–25 |
| मुख्य चिंता | ऋण डिलिंक्वेंसी में तेज वृद्धि |
| सबसे कमज़ोर प्रदर्शन वाला राज्य | बिहार |
| ग्रामीण ग्राहक हिस्सेदारी | 71% |
| महिला-नेतृत्व SHGs | 88% |
| औसत फंडिंग लागत | 11.33% |
| निम्न RoE वाले MLIs | उल्लेखनीय बढ़ोतरी (RoE < 1%) |
| सरकारी कार्यक्रम | SHG–Bank Linkage, प्रधानमंत्री मुद्रा योजना, NABARD Refinance Support |





