हेल्थकेयर रिसर्च में बड़ी कामयाबी
भारत ने 13 फरवरी, 2026 को लाइसोसोमल स्टोरेज डिसऑर्डर (LSDs) के लिए अपना पहला सरकारी मदद वाला नेशनल बायोबैंक लॉन्च किया है। इस पहल में 15 राज्यों के 530 मरीज़ों के बायोलॉजिकल सैंपल और क्लिनिकल डेटा को मिलाया गया है, जिससे यह रेयर बीमारियों की रिसर्च के लिए एक बड़ा नेशनल रिसोर्स बन गया है।
इस प्रोजेक्ट को भारत सरकार के तहत डिपार्टमेंट ऑफ़ बायोटेक्नोलॉजी (DBT) ने फंड किया है। इसमें छह राज्यों और दो केंद्र शासित प्रदेशों के 28 मेडिकल और रिसर्च इंस्टीट्यूशन के बीच सहयोग शामिल है। यह सेंट्रलाइज़्ड सिस्टम बीमारी की ट्रैकिंग और थेरेपी डेवलपमेंट को बेहतर बनाएगा।
स्टेटिक GK फैक्ट: डिपार्टमेंट ऑफ़ बायोटेक्नोलॉजी (DBT) की स्थापना 1986 में भारत में बायोटेक्नोलॉजी रिसर्च को बढ़ावा देने के लिए की गई थी।
लाइसोसोमल स्टोरेज डिसऑर्डर को समझना
लाइसोसोमल स्टोरेज डिसऑर्डर (LSDs) 70 से ज़्यादा दुर्लभ वंशानुगत मेटाबोलिक बीमारियों का एक ग्रुप है जो एंजाइम की कमी से होती हैं। ये एंजाइम आमतौर पर सेल्स के अंदर फैट और शुगर को तोड़ते हैं। जब एंजाइम नहीं होते हैं, तो नुकसानदायक चीजें जमा हो जाती हैं और अंगों को नुकसान पहुंचाती हैं।
भारत में LSD के लगभग 12,000 से ज़्यादा मरीज़ हैं, लेकिन इलाज सिर्फ़ कुछ ही बीमारियों के लिए मौजूद है। एंजाइम रिप्लेसमेंट थेरेपी जैसी उपलब्ध थेरेपी पर हर मरीज़ पर सालाना ₹1 करोड़ से ज़्यादा का खर्च आता है।
बायोबैंक डेटा एक गंभीर हेल्थकेयर चुनौती दिखाता है, क्योंकि 530 रजिस्टर्ड मरीज़ों में से 60% की मौत हो गई है, और अभी सिर्फ़ आठ मरीज़ों को इलाज मिल रहा है।
स्टेटिक GK टिप: भारत में दुर्लभ बीमारियों को ऐसी कंडीशन माना जाता है जो 2,500 में से 1 से भी कम लोगों को प्रभावित करती हैं।
स्ट्रक्चर और साइंटिफिक स्कोप
इस पहल को फाउंडेशन फॉर रिसर्च इन जेनेटिक्स एंड एंडोक्राइनोलॉजी (FRIGE) और इंस्टीट्यूट ऑफ ह्यूमन जेनेटिक्स, अहमदाबाद लीड कर रहे हैं। बायोबैंक 8 LSD सबग्रुप के तहत 27 डिसऑर्डर को कवर करता है।
इकट्ठे किए गए बायोलॉजिकल सैंपल में जीनोमिक DNA, प्लाज़्मा और यूरिन सैंपल शामिल हैं, जो साइंटिस्ट को जेनेटिक म्यूटेशन और एंजाइम एक्टिविटी को एनालाइज़ करने में मदद करते हैं।
रिकॉर्ड किए गए आम डिसऑर्डर में गौचर डिज़ीज़ (70 केस), टे–सैक्स डिज़ीज़ (62 केस), और मोरक्विओ–ए सिंड्रोम (40 केस) शामिल हैं।
इन सैंपल को एक सेंट्रलाइज़्ड डिजिटल प्लेटफॉर्म पर स्टोर किया जाता है, जिससे पूरे भारत में साइंटिस्ट के लिए एक्सेसिबिलिटी बेहतर होती है।
स्टैटिक GK फैक्ट: ह्यूमन जीनोम प्रोजेक्ट, जो 2003 में पूरा हुआ, ने जेनेटिक डिज़ीज़ रिसर्च में ग्लोबल एडवांसमेंट को मुमकिन बनाया।
रिसर्च कोलेबोरेशन और इनोवेशन
कई बड़े इंस्टीट्यूशन एक्टिवली बायोबैंक का इस्तेमाल कर रहे हैं। टाटा इंस्टीट्यूट फॉर जेनेटिक्स एंड सोसाइटी (TIGS), बेंगलुरु स्टेम सेल-बेस्ड डिज़ीज़ मॉडल डेवलप कर रहा है। इंस्टीट्यूट फॉर स्टेम सेल साइंस एंड रीजेनरेटिव मेडिसिन (inStem) एडवांस्ड थेराप्यूटिक तरीकों पर फोकस कर रहा है।
इस बीच, सेंटर फॉर DNA फिंगरप्रिंटिंग एंड डायग्नोस्टिक्स (CDFD), हैदराबाद स्पेक्ट्रोमेट्री-बेस्ड स्क्रीनिंग टेक्नोलॉजी पर काम कर रहा है।
इन कोलेबोरेशन का मकसद देसी रिसर्च कैपेबिलिटी का इस्तेमाल करके सस्ते डायग्नोस्टिक टूल और ट्रीटमेंट डेवलप करना है।
स्टैटिक GK फैक्ट: CDFD डिपार्टमेंट ऑफ बायोटेक्नोलॉजी के तहत काम करता है।
नेशनल इंपॉर्टेंस और फ्यूचर इम्पैक्ट
नेशनल बायोबैंक बायोलॉजिकल सैंपल और जीनोमिक डेटा को सेंट्रलाइज करके इंडिया के रेयर डिजीज इकोसिस्टम में एक बड़ी कमी को दूर करता है। इससे अर्ली डायग्नोसिस, थेरेपी डेवलपमेंट और स्क्रीनिंग प्रोग्राम में तेजी आएगी।
यह भारत के कॉस्ट–इफेक्टिव देसी ट्रीटमेंट डेवलप करने के लक्ष्य को सपोर्ट करता है और महंगी इम्पोर्टेड थेरेपी पर डिपेंडेंस कम करता है।
लॉन्ग टर्म में, यह पहल रेयर जेनेटिक डिसऑर्डर से प्रभावित बच्चों के सर्वाइवल रेट और हेल्थकेयर आउटकम में सुधार करेगी।
यह एक मजबूत और सेल्फ–रिलायंट बायोमेडिकल रिसर्च इकोसिस्टम बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
स्टैटिक उस्थादियन करंट अफेयर्स तालिका
| विषय | विवरण |
| पहल | लाइसोसोमल भंडारण विकारों के लिए भारत का प्रथम राष्ट्रीय जैव भंडार |
| प्रारंभ तिथि | 13 फरवरी 2026 |
| वित्तपोषण एजेंसी | जैव प्रौद्योगिकी विभाग |
| प्रमुख संस्थान | आनुवंशिकी एवं अंतःस्रावी अनुसंधान प्रतिष्ठान तथा मानव आनुवंशिकी संस्थान |
| रोगी कवरेज | 15 राज्यों के 530 रोगी |
| रोग प्रकार | दुर्लभ वंशानुगत उपापचयी विकार |
| प्रमुख दर्ज विकार | गौचर रोग, टे-सैक्स रोग, मोरक्वियो-ए सिंड्रोम |
| प्रमुख अनुसंधान सहयोगी | आनुवंशिकी एवं समाज संस्थान बेंगलुरु, स्टेम सेल विज्ञान एवं पुनर्योजी चिकित्सा संस्थान बेंगलुरु, डीएनए फिंगरप्रिंटिंग एवं निदान केंद्र हैदराबाद |
| उद्देश्य | किफायती निदान और उपचार विकसित करना |
| राष्ट्रीय महत्व | दुर्लभ रोग अनुसंधान एवं स्वास्थ्य अवसंरचना को सुदृढ़ करना |





