हाल की रिपोर्ट का ओवरव्यू
‘हिंदू कुश हिमालयी क्षेत्र में 1990 से 2020 तक ग्लेशियरों के बदलते डायनामिक्स‘ शीर्षक वाली रिपोर्ट ICIMOD ने जारी की है। यह रिपोर्ट 1990–2020 के बीच HKH क्षेत्र में ग्लेशियर बदलावों का एक व्यापक आकलन प्रस्तुत करती है और बताती है कि इस पूरे क्षेत्र में ग्लेशियर तेज़ी से सिमट रहे हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, 21वीं सदी में बर्फ़ के नुकसान की दर दोगुनी हो गई है, और यह रुझान जलवायु परिवर्तन के बढ़ते असर को दिखाता है। यह चिंता इसलिए भी बड़ी है क्योंकि यह क्षेत्र कई बड़े नदी बेसिनों को पोषित करता है, जिन पर दक्षिण एशिया में बड़ी आबादी निर्भर है।
स्टैटिक GK फैक्ट: हिंदू कुश हिमालय (HKH) क्षेत्र आठ देशों में फैला है, जिनमें भारत, नेपाल, भूटान, चीन और पाकिस्तान शामिल हैं।
ICIMOD के बारे में
ICIMOD यानी International Centre for Integrated Mountain Development एक अंतर–सरकारी संगठन है, जो पर्वतीय क्षेत्रों में सस्टेनेबल डेवलपमेंट, क्लाइमेट रिसर्च और रीजनल सहयोग पर काम करता है। यह सदस्य देशों के लिए ज्ञान–साझाकरण मंच की तरह काम करता है।
इस संस्था का मुख्यालय काठमांडू, नेपाल में है, और भारत इसके सदस्य देशों में शामिल है। ग्लेशियर मॉनिटरिंग, जोखिम आकलन और रेज़िलिएंस बढ़ाने में इसकी भूमिका बहुत अहम मानी जाती है।
स्टेटिक GK टिप: ICIMOD का हेडक्वार्टर काठमांडू में स्थित है, जो इसे हिमालयी शोध का एक महत्वपूर्ण केंद्र बनाता है।
रिपोर्ट के मुख्य नतीजे
रिपोर्ट बताती है कि 1990 से 2020 के बीच HKH ग्लेशियरों ने अपने कुल क्षेत्रफल का लगभग 12% खो दिया, जबकि आइस रिज़र्व में लगभग 9% की गिरावट आई। यह सिर्फ़ क्षेत्रफल में कमी नहीं, बल्कि बर्फ़ की मोटाई और मात्रा में भी गिरावट का संकेत है।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि 1990–2010 के मुकाबले हाल के वर्षों में आइस लॉस की दर लगभग दोगुनी हो गई है। यही इस अध्ययन का सबसे चिंताजनक निष्कर्ष है।
सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र जैसे बड़े बेसिनों पर असर अलग-अलग तीव्रता का दिखा, और खास तौर पर पूर्वी हिमालय के हिस्सों में नुकसान अधिक गंभीर पाया गया। आपके दिए गए 6%, 21% और 16% वाले बेसिन-विशिष्ट आँकड़े मुझे खुले स्रोतों में सीधे सत्यापित नहीं मिले, इसलिए उन्हें मैं पक्का नहीं कहूँगा।
स्टैटिक GK फैक्ट: सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र नदियाँ हिमालयी हिमनदों से पोषित होती हैं और दक्षिण एशिया की जल सुरक्षा के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं।
ग्लेशियर के पीछे हटने के कारण
ग्लोबल वार्मिंग इस नुकसान का सबसे बड़ा कारण है, क्योंकि ऊँचाई वाले इलाकों में भी तापमान लगातार बढ़ रहा है। इससे ग्लेशियर पिघलने की प्रक्रिया तेज़ हो रही है।
इसके अलावा, ब्लैक कार्बन जैसे कण बर्फ़ की सतह पर जमकर उसकी परावर्तन क्षमता घटाते हैं, जिससे अधिक गर्मी अवशोषित होती है और पिघलना और तेज़ हो जाता है। बदलते वर्षा पैटर्न, कम बर्फबारी, और मानवीय उत्सर्जन भी इस असंतुलन को बढ़ाते हैं।
स्टैटिक GK टिप: ब्लैक कार्बन वायुमंडलीय प्रदूषण का एक घटक है, जो हिम और बर्फ़ के पिघलने की दर बढ़ा सकता है।
पानी और इकोसिस्टम पर असर
ग्लेशियरों के पीछे हटने से नदी प्रवाह के पैटर्न बदलते हैं। शुरुआती दौर में पिघलने के कारण पानी अधिक मिल सकता है, लेकिन लंबे समय में जल उपलब्धता घटने का खतरा बढ़ता है। इसका सीधा असर खेती, पीने के पानी और हाइड्रोपावर पर पड़ सकता है।
रिपोर्टों में Glacial Lake Outburst Floods (GLOFs), भूस्खलन, हिमस्खलन और नाज़ुक पहाड़ी इकोसिस्टम पर बढ़ते दबाव का भी उल्लेख है। यह सिर्फ़ पर्यावरण का नहीं, बल्कि मानव सुरक्षा और आजीविका का भी मुद्दा है।
आगे का रास्ता
रिपोर्ट रीजनल सहयोग, बेहतर मॉनिटरिंग सिस्टम, और मजबूत क्लाइमेट एक्शन की ज़रूरत पर ज़ोर देती है। सस्टेनेबल वॉटर मैनेजमेंट, जोखिम पूर्वानुमान, और अनुकूलन रणनीतियाँ अब बेहद ज़रूरी हो गई हैं।
साइंटिफिक रिसर्च, डेटा–आधारित नीति निर्माण, और पर्वतीय समुदायों की रेज़िलिएंस बढ़ाने में निवेश से भविष्य के जोखिम कम किए जा सकते हैं। HKH क्षेत्र की सुरक्षा लंबे समय तक पारिस्थितिक संतुलन और मानव जीवन दोनों के लिए निर्णायक है।
Static Usthadian Current Affairs Table
| विषय | विवरण |
| रिपोर्ट का शीर्षक | एचकेएच में हिमनदों की बदलती गतिशीलता |
| जारीकर्ता | आईसीआईएमओडी |
| आच्छादित क्षेत्र | हिंदू कुश हिमालय |
| हिमनद हानि की प्रवृत्ति | बढ़कर -5.4% से -10% तक पहुंची |
| कुल क्षेत्रफल में कमी | 12% की गिरावट |
| बर्फ भंडार में कमी | 9% की गिरावट |
| सिंधु बेसिन में हानि | 6% |
| गंगा बेसिन में हानि | 21% |
| ब्रह्मपुत्र बेसिन में हानि | 16% |
| मुख्य चिंता | जलवायु परिवर्तन और हिमनदों का पीछे हटना |





