ऐतिहासिक न्यायिक प्रयोग
भारत के सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में हरीश राणा बनाम भारत संघ मामले में अपना फैसला सुनाते हुए, पहली बार एक खास मामले में पैसिव यूथेनेशिया फ्रेमवर्क लागू किया। कोर्ट ने एक ऐसे मरीज़ के लिए कृत्रिम जीवन रक्षक प्रणाली (आर्टिफिशियल लाइफ सपोर्ट) हटाने की अनुमति दी, जो 12 साल से ज़्यादा समय से वेजिटेटिव स्टेट (अचेतन अवस्था) में था।
यह फैसला ‘मरीज़ के सर्वोत्तम हित के सिद्धांत‘ (Best Interest of the Patient Principle) पर आधारित था, जो इस बात पर ज़ोर देता है कि जब चिकित्सकीय रूप से ठीक होना असंभव हो, तो मरीज़ की गरिमा और कल्याण की रक्षा की जाए। मरीज़ के माता–पिता और दोनों मेडिकल बोर्ड इस नतीजे पर एकमत थे कि उसके ठीक होने की कोई संभावना नहीं है।
कोर्ट ने मरीज़ की लंबे समय से चली आ रही पीड़ा और स्पष्ट चिकित्सकीय सहमति को देखते हुए, 30 दिन की सामान्य प्रतीक्षा अवधि (वेटिंग पीरियड) में भी छूट दे दी।
स्टैटिक GK तथ्य: भारत के सुप्रीम कोर्ट की स्थापना 1950 में हुई थी और यह संविधान के भाग V के तहत सर्वोच्च संवैधानिक न्यायालय है।
यूथेनेशिया (इच्छामृत्यु) को समझना
यूथेनेशिया का मतलब है, किसी लाइलाज बीमारी से होने वाली अत्यधिक पीड़ा से राहत दिलाने के लिए, जान–बूझकर किसी व्यक्ति की मृत्यु कर देना या उसकी मृत्यु की प्रक्रिया को तेज़ कर देना। इसे मोटे तौर पर पैसिव यूथेनेशिया (निष्क्रिय इच्छामृत्यु) और एक्टिव यूथेनेशिया (सक्रिय इच्छामृत्यु) में बांटा गया है।
पैसिव यूथेनेशिया में, जीवन को लंबा खींचने वाले चिकित्सकीय उपचार को रोक देना या हटा देना शामिल है, जिससे मरीज़ की मृत्यु स्वाभाविक रूप से हो सके। इसमें वेंटिलेटर सपोर्ट, फीडिंग ट्यूब, या जीवन को बनाए रखने वाले अन्य चिकित्सकीय उपायों को बंद करना शामिल हो सकता है।
इसके विपरीत, एक्टिव यूथेनेशिया में, किसी डॉक्टर द्वारा जान–बूझकर कोई ऐसा काम करना शामिल है — आमतौर पर जानलेवा दवाएँ देकर — जिससे मरीज़ की मृत्यु हो जाए।
भारत में, एक्टिव यूथेनेशिया अभी भी गैर–कानूनी है, जबकि पैसिव यूथेनेशिया की अनुमति सख्त न्यायिक दिशानिर्देशों के तहत दी गई है।
स्टैटिक GK टिप: नीदरलैंड और बेल्जियम जैसे देशों ने विनियमित कानूनी ढांचों के तहत एक्टिव और पैसिव, दोनों तरह के यूथेनेशिया को कानूनी मान्यता दे दी है।
भारत में कानूनी स्थिति का विकास
भारत में यूथेनेशिया से जुड़ा कानूनी ढांचा, सुप्रीम कोर्ट के कई ऐतिहासिक फैसलों के ज़रिए विकसित हुआ है।
अरुणा रामचंद्र शानबाग मामला (2011) इस दिशा में उठाया गया पहला महत्वपूर्ण न्यायिक कदम था। हालांकि, कोर्ट ने उस मामले में यूथेनेशिया की अनुमति नहीं दी थी, लेकिन उसने ऐसी चिकित्सकीय स्थितियों वाले मरीज़ों के लिए, जिनमें सुधार की कोई गुंजाइश न हो, सख्त सुरक्षा उपायों के साथ पैसिव यूथेनेशिया की अनुमति दे दी थी।
‘कॉमन कॉज़‘ फ़ैसले (2018) में एक बड़ा संवैधानिक बदलाव हुआ। कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत ‘गरिमा के साथ मरने के अधिकार‘ को ‘जीवन के अधिकार‘ का हिस्सा माना।
इस फ़ैसले में ‘लिविंग विल‘ या ‘एडवांस मेडिकल डायरेक्टिव‘ की अवधारणा भी पेश की गई, जिससे व्यक्ति पहले से ही यह तय कर सकते हैं कि अगर वे कभी शारीरिक या मानसिक रूप से अक्षम हो जाते हैं, तो उनका मेडिकल इलाज कैसे किया जाए।
लागू करने के लिए संशोधित दिशा–निर्देश
‘पैसिव यूथेनेशिया‘ (इलाज बंद करके मृत्यु को स्वीकार करना) को बेहतर ढंग से लागू करने के लिए, सुप्रीम कोर्ट ने 2023 में दिशा–निर्देशों में बदलाव किया।
इन संशोधित नियमों के अनुसार, ‘लाइफ़ सपोर्ट‘ हटाने से पहले दो अलग–अलग मेडिकल बोर्ड मरीज़ की हालत की जाँच करेंगे। इनमें एक ‘प्राइमरी मेडिकल बोर्ड‘ और एक ‘सेकेंडरी मेडिकल बोर्ड‘ शामिल होगा; दोनों में ही योग्य मेडिकल विशेषज्ञ होंगे।
ये बोर्ड इस बात पर अपनी स्वतंत्र और विशेषज्ञ राय देंगे कि क्या मरीज़ के हित में इलाज जारी रखना सही है।
स्टैटिक GK तथ्य: अनुच्छेद 21 ‘जीवन के अधिकार‘ और ‘व्यक्तिगत स्वतंत्रता‘ की गारंटी देता है, और सुप्रीम कोर्ट ने कई ऐतिहासिक फ़ैसलों के ज़रिए इसकी व्याख्या का दायरा बढ़ाया है।
भविष्य के कानूनी ढाँचे के लिए निर्देश
इस मामले पर फ़ैसला सुनाते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने संसद से आग्रह किया कि वह ‘जीवन के अंतिम चरण की देखभाल‘ और ‘पैसिव यूथेनेशिया‘ पर एक व्यापक कानून बनाए।
कोर्ट ने भविष्य के मामलों में प्रक्रिया को आसान बनाने के लिए कुछ प्रशासनिक निर्देश भी जारी किए। कोर्ट ने हाई कोर्ट्स को निर्देश दिया कि वे यह सुनिश्चित करें कि जब भी कोई अस्पताल मेडिकल बोर्ड की मंज़ूरी के बाद ‘लाइफ़ सपोर्ट‘ हटाने या रोकने का फ़ैसला करे, तो इसकी जानकारी ‘न्यायिक मजिस्ट्रेट‘ को दी जाए।
इन उपायों का उद्देश्य जीवन के अंतिम चरण से जुड़े संवेदनशील फ़ैसलों में पारदर्शिता, कानूनी निगरानी और मरीज़ की गरिमा को बनाए रखना है।
Static Usthadian Current Affairs Table
| Topic | Detail |
| मामले का नाम | हरिश राणा बनाम भारत संघ |
| प्रमुख निर्णय | सर्वोच्च न्यायालय ने कृत्रिम जीवन-समर्थन हटाने की अनुमति दी |
| लागू सिद्धांत | मरीज के सर्वोत्तम हित का सिद्धांत |
| कानूनी आधार | अनुच्छेद 21 के तहत गरिमा के साथ मरने का अधिकार |
| प्रमुख निर्णय | कॉमन कॉज़ मामला (2018) |
| पूर्व महत्वपूर्ण मामला | अरुणा रामचंद्र शानबाग मामला (2011) |
| दिशा-निर्देश अद्यतन | सर्वोच्च न्यायालय ने 2023 में निष्क्रिय इच्छामृत्यु दिशानिर्देशों में संशोधन किया |
| चिकित्सा निगरानी | प्राथमिक और द्वितीयक मेडिकल बोर्ड आवश्यक |
| संसद को निर्देश | जीवन के अंतिम चरण की देखभाल पर व्यापक कानून बनाने का निर्देश |
| प्रशासनिक निर्देश | अस्पतालों को उच्च न्यायालयों के माध्यम से न्यायिक मजिस्ट्रेट को सूचित करना होगा |





